‘रवीन्द्र मंच का विलाप’

Spread the love

‘जामुन का पेड़ गिरने से रवीन्द्र मंच की मौत’

राजेन्द्र सिंह गहलोत
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

रंगमंच के वरिष्ठ कलाकारों ने कृष्ण चंद्र की कहानी ‘जामुन के पेड़’ पर आधारित नाटक का मंचन 15 मार्च को रवीन्द्र मंच के मुख्य सभागार में किया। कहानी का नाट्य रूपांतरण नीरज गोस्वामी और निर्देशन गुरमिंदर सिंह पुरी ने किया।

इनके अलावा नाटक को अपने अभिनय से जीवंत करने वाले अभिनेताओं में राजेंद्र शर्मा ‘राजू’, ईश्वर दत्त माथुर, लोकेश कुमार सिंह, मोइनुद्दीन खान, अशोक माहेश्वरी, आलोक चतुर्वेदी, दीपक कथूरिया, जितेंन्द्र, धनराज, यादवेन्द्र में से अधिकांश रवीन्द्र मंच की आयु से भी बड़े थे, उन्होंने तो फिर भी अधिकांश समय मंच पर बिताया परंतु नवीन पीढ़ी के कलाकारों कवितेश शर्मा, मिहिजा शर्मा, श्रेया व्यास को तो मंच पर बिताने का समय बहुत कम मिला और शायद आने वाली पीढ़ियों को तो मंच पर बिताने का इतना समय भी न मिले और वह पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को रवीन्द्र मंच की कहानी किस्से सुनाने वाले अफसाना निगार समझें।
नाटक भी शानदार था जिसे रोशनी दी थियेटर आर्टिस्ट अनिल मारवाड़ी ने और संगीत व्यवस्था रही थिएटर आर्टिस्ट मनोज स्वामी की और रवीन्द्र मंच की मौत पर विलाप किया गया, वह भी निरर्थक नहीं था।

निरर्थक इसलिए नहीं था, क्योंकि रवीन्द्र मंच की दीवारें जर्जर हो रही है, और उन्होंने कहा कि मुक्ताकाशी मंच पर तो कुत्ते पेशाब कर रहे हैं, रवीन्द्र मंच की अधिकांश लाइटें खराब है, साउंड सिस्टम ठीक नहीं है, पंखे और ए.सी. चालू नहीं हैं, पीनें को पानी नहीं है, सफाईकर्मी नहीं है शौचालय में पाखाना पड़ा रहता है, पानी की बोतल या चाय नाश्ता खरीदने के लिए कैंटीन नहीं है। और तो और रवीन्द्र मंच के अधिकांश कर्मचारी रिटायर्ड हो गये तो कर्मचारी नहीं है, जब कुछ भी नहीं है तो अधिकारी क्या करेगा तो अधिकारी भी नहीं है, एडिशनल चार्ज वाले अधिकारी के भरोसे रवीन्द्र मंच चल भी नहीं रहा घिसट रहा है, क्योंकि प्रशासनिक अमले में एडिशनल चार्ज का मतलब इस तरह लिया जाता है कि जरूरी फाइलों पर जरूरी हस्ताक्षर करवा लो यानि रूटीन के हस्ताक्षर, जिम्मेदारी वाला कोई काम एडिशनल चार्ज लेने वाला अधिकारी नहीं करता, उसके अपने तर्क होते हैं कि मेरे पास ओरिजनल सीट का ही इतना काम है कि दूसरे काम को देखने का समय ही नहीं है।

रवीन्द्र मंच में पदस्थापित पदाधिकारियों की बात करें तो सोविला माथुर का कार्यकाल अच्छा था, जिन्होंने जवाहर कला केंद्र की तर्ज पर रवीन्द्र मंच पर भी फ्राइडे थिएटर की शुरुआत की थी लेकिन फिर उनके प्रसूति अवकाश पर जाने के बाद तत्समय की रवीन्द्र मंच प्रबंधक द्वारा बजट नहीं होने का बहाना करके फ्राइडे थिएटर बंद कर दिया गया जबकि फ्राइडे थिएटर का पूरा बजट खर्च भी नहीं हुआ था। उसके बाद नये बजट के लिए किसी अधिकारी ने प्रस्ताव नहीं भेजा। इस तरह सोविला माथुर ने नेकनीयत से जिस फ्राइडे थिएटर की शुरुआत की थी, बाद के प्रशासनिक अधिकारियों के निकम्मेपन के कारण वह फ्राइडे थिएटर सदा के लिए बंद हो गया।

जिस तरह अच्छे कार्यों के लिए सोविला माथुर का नाम ज़ुबान पर आता है उसी तरह रवीन्द्र मंच का पतन करने वाले अधिकारियों में दीप्ति कच्छावा और प्रियंका राठौड़ के नाम उल्लेखनीय हैं जिन्होंने रंगकर्मियों, मीडिया के विरूद्ध शिकंजा कसने के लिए रवीन्द्र मंच पर होमगार्ड्स और पुलिस का घेरा बिठा दिया था ताकि थिएटर आर्टिस्ट एसोसिएशन ऑफ जयपुर के बैनर तले एकत्रित होकर रवीन्द्र मंच को बचाने के नारे लगाने वाले रंगकर्मी पुलिस व होमगार्ड्स की लाठियों से बचकर रवीन्द्र मंच के बाहर नहीं निकल जाएं, इन होमगार्ड की हिम्मत तो इतनी खुली कि इन्होंने बाद में मीडिया के काम में ही दखलंदाजी शुरू कर दी, उनके कैमरे तोड़ दिये, उनके साथ मारपीट की, उनके कपड़े फाड़ दिए।

रवीन्द्र मंच जब जिंदा था तो द्वार पर कोई रजिस्टर लेकर बैठा होमगार्ड नहीं था, रंग टोलियां शाम के समय सैकड़ों की तादाद में रवीन्द्र मंच के अहाते में रीडिंग किया करती व खुले में रिहर्सल किया करती। असल में रवीन्द्र मंच पर होमगार्ड्स की जरूरत ही नहीं है ये मुफ्त की तनख्वाह लेते हैं और रवीन्द्र मंच के अधिकारी की धौंस देकर रंगकर्मियों को परेशान करते हैं।

होमगार्ड्स की तानाशाही का आलम तो यह है कि एक बार डायरेक्टर मुकेश चतुर्वेदी और उसकी टीम की सायं 6 से रात 10 बजे तक की बुकिंग थी, रात 9 बजे वह अपनी टीम के साथ मंचित नाटक के संबंध में डिस्कसन कर रहे थे तो होमगार्ड्स ने उन्हें रवीन्द्र मंच के बाहर निकाल दिया, जबकि उनकी बुकिंग 10 बजे तक की थी। होमगार्ड्स खुद को बाउंसर समझते हैं इनको रवीन्द्र मंच से बेदखल करना नितांत आवश्यक है क्योंकि रवीन्द्र मंच कोई सेंट्रल जेल नहीं है कि मुलाकातियों की रजिस्टर में एंट्री हो।

नाटक के अंत में पीड़ा जाहिर की गई कि सरकार रवीन्द्र मंच को मार देगी, बेच देगी, रामनिवास बाग में रवीन्द्र मंच को ढहाकर पार्किंग, मसाला चौक या कोई काम्प्लेक्स बनवा देगी, इससे पहले कि ऐसा हो यह विलाप इसलिए है कि किसी प्रशासनिक अधिकारी में आत्मा हो तो वो जागे, वर्तमान में अनुराधा गोगोई प्रशासनिक अधिकारी और कला एवं संस्कृति मंत्री दीया कुमारी से यह आशा की जा सकती है कि वे रवीन्द्र मंच को मरने नहीं देंगे।


Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *