शिक्षक : राष्ट्र निर्माता

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Col. ( Dr.) Baldev Singh Manav

Zila Sainik Kalyan Adhikari, Shergarh

राष्ट्र केवल संसदों, प्रयोगशालाओं, कारखानों या युद्धभूमियों में नहीं बनते। राष्ट्र का निर्माण हर सुबह कक्षाओं में होता है—उन कक्षाओं में, जहाँ शिक्षक उन मस्तिष्कों, व्यक्तित्वों और चरित्रों को आकार देते हैं जो कल देश की दिशा तय करेंगे।
1964–66 के शिक्षा आयोग के अध्यक्ष डॉ. दौलत सिंह कोठारी ने अपने समय से बहुत आगे जाकर इस सत्य को अत्यंत प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त किया था—
“The destiny of India is now being shaped in her classrooms. This, we believe, is no mere rhetoric.”
अर्थात्, भारत का भाग्य आज उसकी कक्षाओं में गढ़ा जा रहा है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। आयोग ने आगे स्पष्ट किया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर आधारित दुनिया में किसी देश की समृद्धि, कल्याण और सुरक्षा काफी हद तक उसकी शिक्षा पर निर्भर करती है।
लेकिन एक प्रश्न स्वाभाविक है—कक्षाओं में भारत का भाग्य कौन गढ़ता है?
उत्तर है—शिक्षक।
इसीलिए कोठारी आयोग ने शिक्षक को शिक्षा व्यवस्था का महज एक घटक नहीं माना। उसने कहा—
“Of all the different factors which influence the quality of education and its contribution to national development, the quality, competence and character of teachers are undoubtedly the most significant.”
और शिक्षक की गुणवत्ता के महत्व को रेखांकित करते हुए आयोग ने इससे भी आगे कहा—
“Nothing is more important than securing a sufficient supply of high quality recruits to the teaching profession, providing them with the best possible professional preparation and creating satisfactory conditions of work in which they can be fully effective.”
इन शब्दों का महत्व आज, लगभग छह दशक बाद, और भी बढ़ गया है। कोठारी आयोग ने केवल अच्छे शिक्षक की आवश्यकता नहीं बताई थी; उसने शिक्षण पेशे में उच्च गुणवत्ता वाले युवाओं को आकर्षित करने, उन्हें सर्वोत्तम व्यावसायिक तैयारी देने और ऐसा कार्य वातावरण उपलब्ध कराने की बात कही थी जिसमें वे अपनी पूरी क्षमता से प्रभावी हो सकें।
यानी राष्ट्र निर्माण की पहली शर्त केवल अच्छे विद्यालय बनाना नहीं है—अच्छे शिक्षक बनाना है।
पाठ्यपुस्तक से कहीं आगे
शिक्षक का काम केवल विषय पढ़ा देना नहीं है। गणित का शिक्षक संख्याएँ सिखाता है, विज्ञान का शिक्षक प्रकृति के नियम समझाता है, इतिहास का शिक्षक अतीत से परिचित कराता है और भाषा का शिक्षक अभिव्यक्ति की शक्ति देता है। लेकिन एक महान शिक्षक इससे कहीं अधिक करता है।
वह विद्यार्थी को सोचना, प्रश्न करना, तर्क करना, असहमति व्यक्त करना, सत्य की खोज करना और सही निर्णय लेना सिखाता है। वह ज्ञान को विवेक से और बुद्धि को चरित्र से जोड़ता है।
एक राष्ट्र को केवल कुशल डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, सैनिक, प्रशासक और उद्यमी नहीं चाहिए। उसे ऐसे जिम्मेदार नागरिक भी चाहिए जो अधिकारों के साथ कर्तव्यों को समझें, स्वतंत्रता के साथ अनुशासन को स्वीकार करें, असहमति को शत्रुता न बनने दें और सफलता के साथ संवेदनशीलता को जीवित रखें।
इन नागरिकों का निर्माण मतदान की उम्र आने के बाद नहीं होता। इसकी शुरुआत बहुत पहले हो जाती है—कक्षा में।
एक शिक्षक जब प्रत्येक बच्चे के साथ समान सम्मान का व्यवहार करता है, तो वह समानता सिखाता है। जब वह प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करता है, तो वह लोकतांत्रिक सोच विकसित करता है। जब वह ईमानदारी से समझौता नहीं करता, तो वह चरित्र गढ़ता है। जब वह कमजोर विद्यार्थी को भी अवसर देता है, तो वह सामाजिक न्याय का पाठ पढ़ाता है।
इस अर्थ में हर कक्षा नागरिकता की एक छोटी प्रयोगशाला है।
तकनीक के युग में शिक्षक की नई भूमिका
आज शिक्षक के सामने चुनौती पहले से अलग है। एक स्मार्टफोन में ऐसी सूचना उपलब्ध है जिसे कभी पूरी लाइब्रेरी में खोजना पड़ता था। इंटरनेट लगभग हर प्रश्न का उत्तर खोज सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ ही क्षणों में जानकारी को व्यवस्थित कर सकती है।
तो फिर शिक्षक की आवश्यकता क्यों?
क्योंकि जानकारी और ज्ञान एक ही चीज नहीं हैं।
तकनीक बता सकती है कि क्या हुआ; शिक्षक समझा सकता है कि क्यों हुआ। तकनीक उत्तर दे सकती है; शिक्षक उत्तर की विश्वसनीयता पर प्रश्न करना सिखा सकता है। तकनीक सूचना दे सकती है; शिक्षक उसमें संदर्भ, विवेक, नैतिकता और मानवीय अर्थ जोड़ सकता है।
और सबसे महत्वपूर्ण—तकनीक मनुष्य के चरित्र का स्थान नहीं ले सकती।
इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में शिक्षक अप्रासंगिक नहीं हो रहा; उसकी भूमिका और अधिक गहरी हो रही है।
राष्ट्र निर्माण का पहला वास्तुकार
हम अक्सर राष्ट्र निर्माण को बड़े बाँधों, चौड़ी सड़कों, आधुनिक कारखानों, वैज्ञानिक उपलब्धियों और आर्थिक विकास से जोड़ते हैं। ये सब आवश्यक हैं। लेकिन इनके पीछे मनुष्य चाहिए—कल्पना करने वाला मनुष्य, समस्या सुलझाने वाला मनुष्य, ईमानदारी से निर्णय लेने वाला मनुष्य और कठिन परिस्थितियों में भी सही रास्ता चुनने वाला मनुष्य।
ऐसे मनुष्य अचानक तैयार नहीं होते।
किसी प्रयोगशाला में खड़ा वैज्ञानिक कभी किसी कक्षा में बैठा विद्यार्थी था। सीमा पर खड़ा सैनिक कभी किसी शिक्षक से पहली बार अनुशासन और जिम्मेदारी सीख रहा था। ईमानदार प्रशासक, सफल उद्यमी, चिकित्सक, कलाकार, खिलाड़ी या वैज्ञानिक—इन सबकी यात्रा के किसी न किसी मोड़ पर एक शिक्षक उपस्थित था।
कभी वह शिक्षक किसी प्रतिभा को पहचानने वाला पहला व्यक्ति था। कभी उसने किसी निराश विद्यार्थी को हार मानने से रोका। कभी उसने किसी ग्रामीण बालिका को बड़े सपने देखने का साहस दिया। कभी उसने किसी गरीब बच्चे को बताया कि उसकी परिस्थितियाँ उसकी संभावनाओं की सीमा नहीं हैं।
ऐसे योगदान किसी वार्षिक रिपोर्ट में दर्ज नहीं होते। इनके लिए शिक्षक को कोई पदक नहीं मिलता। लेकिन कई बार एक शिक्षक का एक वाक्य किसी विद्यार्थी की पूरी जिंदगी की दिशा बदल देता है।
यही राष्ट्र निर्माण है।
अच्छे शिक्षक कहाँ से आएँगे?
यदि शिक्षक राष्ट्र निर्माता है, तो शिक्षक बनने वालों का चयन भी राष्ट्रीय महत्व का विषय होना चाहिए।
कोठारी आयोग का संदेश आज भी बिल्कुल स्पष्ट सुनाई देता है—शिक्षण पेशे में उच्च गुणवत्ता वाले युवाओं को आकर्षित किया जाए, उन्हें सर्वोत्तम व्यावसायिक तैयारी दी जाए और उन्हें प्रभावी ढंग से काम करने के लिए उचित परिस्थितियाँ उपलब्ध कराई जाएँ।
इसलिए शिक्षक-शिक्षा को केवल डिग्री प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं बनाया जा सकता। B.Ed. या अन्य शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों में प्रवेश का प्रश्न केवल संख्या का नहीं, गुणवत्ता का प्रश्न है। भविष्य के शिक्षक आज के प्रशिक्षु होते हैं; इसलिए शिक्षक-प्रशिक्षण की गुणवत्ता अंततः आने वाली पीढ़ियों की गुणवत्ता को प्रभावित करेगी।
साथ ही, अच्छे शिक्षक केवल सम्मान से नहीं बनते। उन्हें निरंतर प्रशिक्षण, स्वतंत्र चिंतन, शोध, नवाचार और सीखने के अवसर भी चाहिए। जवाबदेही आवश्यक है, लेकिन जवाबदेही के साथ संस्थागत सहयोग भी उतना ही आवश्यक है।
शिक्षक स्वयं भी विद्यार्थी रहे
आज के शिक्षक के सामने शायद सबसे बड़ी चुनौती यही है कि दुनिया असाधारण गति से बदल रही है।
नई वैज्ञानिक खोजें, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव-प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष विज्ञान, क्वांटम कंप्यूटिंग, डिजिटल अर्थव्यवस्था और नई सामाजिक वास्तविकताएँ हमारे जीवन और भाषा—दोनों को बदल रही हैं। हर वर्ष नए आविष्कारों और नई अवधारणाओं के साथ शब्दकोशों में नए शब्द जुड़ रहे हैं।
ऐसी दुनिया में वह शिक्षक कैसे प्रासंगिक रह सकता है जो स्वयं सीखना बंद कर दे?
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसी सत्य को अत्यंत सुंदर रूपक में व्यक्त किया था—
“A teacher can never truly teach unless he is still learning himself. A lamp can never light another lamp unless it continues to burn its own flame.”
यह केवल एक सुंदर उद्धरण नहीं, बल्कि आज के शिक्षक के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
जो शिक्षक स्वयं सीखना बंद कर देता है, वह धीरे-धीरे अपने विद्यार्थियों की बदलती दुनिया से कटने लगता है।
इसलिए शिक्षक को केवल अध्यापक नहीं, आजीवन शिक्षार्थी होना होगा। उसे नई पुस्तकों के साथ-साथ नई तकनीकों को पढ़ना होगा; नए शोध से परिचित होना होगा; अपने विषय में हो रहे परिवर्तनों को समझना होगा; और सबसे बढ़कर, विद्यार्थियों से भी सीखने की विनम्रता रखनी होगी।
क्योंकि शिक्षक की मशाल तभी तक प्रकाश देती है, जब तक उसकी अपनी लौ जलती रहती है।
राष्ट्र का भविष्य एक कक्षा में बैठा है
आज किसी कक्षा की अंतिम पंक्ति में बैठा बच्चा कल वैज्ञानिक हो सकता है। किसी छोटे गाँव की शांत बालिका कल प्रशासन, विज्ञान, सेना, खेल, उद्यमिता या किसी अन्य क्षेत्र में देश का नेतृत्व कर सकती है। किसी औसत विद्यार्थी में ऐसी प्रतिभा छिपी हो सकती है जिसे केवल एक संवेदनशील शिक्षक पहचान सकता है।
शिक्षक का सबसे बड़ा कौशल यही है—वह उस संभावना को देख सके जिसे अभी दुनिया नहीं देख पा रही।
इसलिए शिक्षक केवल परीक्षा के लिए तैयार नहीं करता; वह जीवन के लिए तैयार करता है। वह केवल करियर नहीं बनाता; नागरिक बनाता है। वह केवल ज्ञान नहीं देता; ज्ञान के उपयोग की दिशा भी देता है।
राष्ट्र की संसदें कानून बना सकती हैं, प्रयोगशालाएँ खोज कर सकती हैं, उद्योग अर्थव्यवस्था बना सकते हैं और सेनाएँ सीमाओं की रक्षा कर सकती हैं। लेकिन इन सबको दिशा देने वाले मनुष्य किसी न किसी दिन एक कक्षा में बैठे थे।
और उनके सामने कोई शिक्षक खड़ा था।
इसीलिए डॉ. कोठारी के शब्द आज भी हमारे सामने एक राष्ट्रीय दायित्व की तरह खड़े हैं—
“The destiny of India is now being shaped in her classrooms.”
यदि भारत का भाग्य कक्षाओं में आकार ले रहा है, तो शिक्षक उन कक्षाओं के शिल्पकार हैं।
और यदि राष्ट्र का भविष्य शिक्षक के हाथों में है, तो शिक्षक का सम्मान, उसकी तैयारी, उसकी गुणवत्ता और उसका निरंतर सीखते रहना केवल शिक्षा विभाग का विषय नहीं—राष्ट्र निर्माण का विषय है।
क्योंकि अंततः राष्ट्र केवल इमारतों, संस्थाओं और नीतियों से नहीं बनते।
राष्ट्र लोगों से बनते हैं।
और लोगों के निर्माण में शिक्षक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।
इसलिए शिक्षक केवल अध्यापक नहीं—सही अर्थों में राष्ट्र निर्माता है।


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