निर्देशक प्रवीण कुमावत के नाटक ‘सवेरा’ का प्रभावी मंचन

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मौत के अंधकार से जीवन के ‘सवेरा’ में ले जाने का प्रयास

राजेन्द्र सिंह गहलोत (वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक)

प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर की रचना पर आधारित नाट्य रूपांतरण ‘सवेरा’ बिजेंद्र सिंह अवाना एवं प्रवीण कुमावत द्वारा किया गया, जिसका प्रभावी मंचन जवाहर कला केंद्र जयपुर की पाक्षिक नाट्य योजना के तहत 26 मार्च को रंगायन सभागार में किया गया।

मौत से किसकी रिश्तेदारी है, आज उसकी तो कल मेरी बारी है, मरना सबको है, लेकिन मौत को आने से पहले मैं भला क्यों हार मानूं, जग अभी जीता नहीं है, मैं अभी हारा नहीं हूं। कुछ इसी तरह का संदेश देते हुए प्रवीण कुमावत द्वारा निर्देशित नाटक दृश्य-दर-दृश्य आगे बढ़ता रहता है। करीब 65 मिनट की समयावधि के इस नाटक का प्रारंभ भी बेहद शानदार था, जिसमें रात्रिकालीन पहरा देने वाले की भूमिका निभा रहे कलाकार सुनील सोगण हाथ में लालटेन लिए जब आवाज लगाते हैं होशियार, खबरदार, जागते रहो, तो रात्रिकालीन सन्नाटे को महसूस किया जा सकता है, यह कलाकार की काबिलियत थी या अच्छी निर्देशकीय क्षमता कि होशियार, खबरदार, जागते रहो और लालटेन की रोशनी के जरिए अंधेरी रात में दूर तक देखने का दृश्य दर्शकों के दिमाग पर स्थाई रूप से छप जाता है।

ज्यों-ज्यों नाटक आगे बढ़ता है, दृश्य-दर-दृश्य जीवन के कई रंग देखने को मिलते हैं, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा युवा शायद थ्री ईडियट्स फिल्म का वह पात्र था जो उसके लिए बना ही नहीं था शायद इसीलिए वह शर्मा जी के बेटे से सफलता की रेस में पिछड़ जाता है, माता-पिता के ताने उसे हताशा-निराशा के दलदल में धकेल देते हैं।

एक दृश्य में पत्नी पीड़ित जिंदगी से हताश हो जाता है, तो दूसरी तरफ एक पत्नी अपने घर के सामान्य कामकाज से ही दुखी रहती है। नाटक बताता है कि अधिकांश मामलों में दुख की कोई बड़ी वजह न होते हुए भी दुखी हुआ जाता है, जिसकी वाकई में कोई जरूरत नहीं होती। रोज के घर के काम हैं करने पड़ेंगे, रोकर करो या हंसकर करो।

एक दृश्य में टुक-टुक कुमार से प्रेम करती है, टुक-टुक की मां और बहन तो नहीं, पर टुक-टुक के पिता इस प्रेम से बहुत पीड़ित रहते हैं, सामाजिक बदनामी के डर से इतना डर जाते हैं कि अवसाद में आ जाते हैं। उधर कुमार टुक-टुक से मौत को गले लगाने की बात करता है।

एक लड़की इसलिए आत्महत्या करना चाहती है क्योंकि उसके चेहरे पर लहसुन है और इस वजह से उसकी शादी नहीं हो पा रही, एक लड़का इसलिए आत्महत्या करना चाहता है कि वह बहरा है और उसकी भी शादी नहीं हो रही, अंत में वह दोनों एक-दूसरे को उनकी कमियों के साथ स्वीकार कर लेते हैं और यही स्वीकारोक्ति उनके जीवन में नया ‘सवेरा’ ले आती है।

‘सवेरा’ मानों संदेश देता है कि कोई भी वजह इतनी बड़ी नहीं होती कि ईश्वर की दी हुई जिंदगी को ठुकरा कर असमय मौत को गले लगा लिया जाए, ये सिर्फ परिस्थितियां हैं जो हमेशा बदलती रहती है जीवन के आकाश में बादलों की मानिंद।

निर्देशक प्रवीण कुमावत ने नाट्य परिकल्पना के साथ ही संगीत की जिम्मेदारी भी संभाली और नाट्य अनुरूप संगीत संयोजन किया ‌। सुनील सोगण की रूप सज्जा, रेणु सनाढ्य का वस्त्र विन्यास, ओमप्रकाश सैनी की प्रकाश परिकल्पना, विकास सैनी की मंच सज्जा, गौरव कुमावत की पोस्टर व ब्रोशर डिजाइन भी नाटक के अनुकूल रही।

विवेक माथुर, अंशिका राजपुरोहित, मानवेन्द्र सिंह परिहार, स्वस्ति खंडेलवाल, पीयूषा सिंघवी, सिमरन महावर, प्रगीत हरपलानी, सुनील सोगण, पार्थ मालसरिया, विजय गुप्ता, बिजेंद्र सिंह अवाना, अंशुमन आर्य ने नाटक में विभिन्न भूमिकाएं प्रभावी अंदाज में निभाई।


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