MAHI SANDESH


कहते हैं कि अपनों के जाने के बाद उनकी यादें ही हमारी सबसे बड़ी धरोहर होती हैं। लेकिन रिणाऊ गाँव में इन यादों ने एक नया रूप ले लिया—ज़िंदगी देने का रूप। पूर्व पंचायत समिति सदस्य, स्व. परमेश्वरी देवी जी की छठी पुण्यतिथि थी। और इस दिन को याद करने का जो तरीका ‘गीतांजलि वेलफेयर संस्थान’ और उनके परिजनों ने चुना, वो सीधे दिल को छूता है। कोई शोर-शराबा नहीं, बल्कि किसी अनजान की रगों में ज़िंदगी बनकर दौड़ने का सुकून—एक शानदार रक्तदान शिविर!
शनिवार का दिन था, गाँव का आंगन और एक नेक मक़सद। जब उप जिला प्रमुख ताराचंद धायल, पूर्व प्रधान भागीरथ जाखड़ और रक्त मोटीवेटर (सुधीर महरिया स्मृति संस्थान) बी. एल. मील जैसे लोग वहाँ पहुँचे, तो माहौल किसी औपचारिक कार्यक्रम का नहीं, बल्कि एक बड़े परिवार के मिलन जैसा था। परमेश्वरी देवी जी की तस्वीर पर जब अपनों ने फूल चढ़ाए और दीप जलाया, तो उस लौ में कई लोगों को नई ज़िंदगी देने का संकल्प साफ झलक रहा था।
सत्येंद्र कुड़ी, रामकुमार बीरड़ा, जीवन राम बीरड़ा, मनोज बड़जाती, सरपंच बंशीलाल जी और भगवान सिंह जी जैसे गाँव-जवाड़ के मौज़िज़ लोगों ने भी एक सुर में यही बात कही—कि श्रद्धांजलि अगर ऐसी हो जो किसी की साँसों की डोर टूटने से बचा ले, तो उससे बड़ा पुण्य भला और क्या होगा?
शिविर के कर्ता-धर्ता राजेंद्र बीरड़ा और महेंद्र बीरड़ा के चेहरों पर एक अलग सा इत्मीनान था। और हो भी क्यों ना? 84 से ज़्यादा लोगों ने आगे बढ़कर अपनी बांहें आगे कर दीं। ये सिर्फ खून नहीं था; ये उस गाँव की मिट्टी की तासीर थी जो मुश्किल वक़्त में हमेशा अपनों के काम आती है। संस्था की तरफ से हर डोनर के हाथ में एक प्रशस्ति-पत्र थमाया गया, लेकिन सच कहूँ तो उनके दिलों में किसी अजनबी की बेहिसाब दुआएँ बस गई थीं।
और हाँ, नेकी की इस बयार में बेज़ुबानों को भी नहीं भुलाया गया। परमेश्वरी देवी जी की याद में गौशाला में गायों के लिए चारे का बढ़िया इंतज़ाम किया गया। सतपाल खटकड़, बीरबल, गोपाल राम, मदनलाल, ओमप्रकाश से लेकर संदीप, अंकित और रियांश जैसे तमाम उत्साही नौजवानों और बुजुर्गों ने मिलकर जो माहौल बनाया, वो बताता है कि हमारे गाँव आज भी एक-दूसरे से किस कदर जुड़े हुए हैं।
सच मानिए, रिणाऊ गाँव ने दिखा दिया कि जो लोग दुनिया से चले जाते हैं, वो कहीं नहीं जाते; वो हमारी ऐसी ही नेक मुहीम और रगों में दौड़ते खून के ज़रिए हमेशा ज़िंदा रहते हैं।
