प्रतिवर्ष 21 मई को अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस मनाया जाता है, जो केवल एक पेय पदार्थ का उत्सव नहीं, बल्कि उन करोड़ों भारतीयों के दिलों की धड़कन एँव आत्मीयता ,आवभगत का रिश्ता है ।इस अवसर पर डॉ. नलिन जोशी के कविता संग्रह “ नलिन सरोवर “ से एक कविता

चलो ना , आज फिर से .
मुँह अंधेरे उठकर
बिना किसी को बताए
निकल पड़ते हैं यूँ ही
तुम्हारी शब्दों में
एक लॉन्ग ड्राइव पर
एक अरसा हो गया
एकांत में तुमसे बतियाये
या फिर किसी पहाड़ पर
सूर्योदय के साथ
पुनः जागृत करें
बासी खट्टे पडे प्रेम को
शायद ठंडी बयार और
चिड़ियों की बोली से
फिर प्रेम का उदय हो जाए
या कहीं किसी नदी के तट पर
जहाँ बहते जल से
तुम्हें मेरे प्रेम की
सतत् अनवरत बहते रहने की
प्रकृति समझ आए
चलो इससे पहले कि हम
दो किनारे बन जाए
पानी बनकर एक साथ
उछलते कूदते
कठिनाई के पाषाणों से
क्रीडा करते
अपने चहुँ ओर
सुख की हरितिमा फैलाए
चलो ना एक बार पूछो
अपनी आत्मा से
हृदय के स्पंदनों से
कौन बसता है वहाँ
क्यों न पुरानी बातों को
दरकिनार कर
एक पुदीना चाय हो जाए
ईर्ष्या-सौतन थोड़ा झगड़ा
दो कश सिगरेट मे
दिनो का अनबोला
धुआँ बन उड जाए
बचपने की कुट्टी
फिर से अब्बा हो जाए
